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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 41

चालीसवाँ सर्ग समाप्त इकतालीसर्वों सर्ग अविद्या के स्वभाव से त्रिलोकीरूपी कठपुतली के नृत्य तथा एकमात्र आत्मत्वभाव से निर्वाण की प्राप्ति का वर्णन।

19 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, अविद्या -स्वभाव से युक्त हुआ यह आत्मा ही सम्…
  2. Verse 2वह विद्या तो तत््वज्ञें के साथ निरन्तर समागम रखने से उत्पन्न विवेकज्ञान जनित वैराग्य से ह…
  3. Verse 3वैशग्यश्रिद्धि के लिए अविद्यास्वभाव से ही शुद्ध ब्रह्म में जयत्‌-रूपी वित्र का अध्यास होत…
  4. Verse 4विद्या-स्वभाव से उस जयत्‌-रुपी चित्र का खण्डन करके अब निर्वाण का स्वरूप दिखलाते हैं / हे…
  5. Verse 5तिजयत्‌-रृपी नाच रही पुतलियों के रुप में मुख्य आविद्या- स्वभाव का वर्णन करते हैं / चिति क…
  6. Verse 6श्रृंगार आदि रसों से रति आदि स्थायिभावों तथा कम्प, स्वेद आदि संचारिभावों से परिपूर्ण नये-…
  7. Verses 7–11भौतिक शरीरो के धारण-पोषण आदि निमित्त से चल-फिर रहे जीव ही इनके बह रहे प्राण मारूत हैं, वन…
  8. Verse 12सुषुप्ति के अवसर में सुषुप्ति-स्वभाव में स्थित न हुई चिति स्वप्न की जैसे कारण बन जाती है…
  9. Verse 13इस तरह अविद्या के स्वभाव का वर्णन करके अब ब्रह्मात्मेक्यस्वथाव से निर्वाणरुप बनाने में उप…
  10. Verse 14हे श्रीरामचन्द्रजी, तत्त्वज्ञान से जाग्रत्‌ काल में जो राग तथा वासना से शून्य सुषुप्ति-अव…
  11. Verse 15अल्यस्वरुप मे निष्ठा होने पर व्यवहारकाल में भी जानी पुरुक को यह सारा जगत्‌ विदेकरसरूय ही…
  12. Verse 16उस अवस्था में ज्ञानी को प्रकाशमान वस्तु में स्थित प्रकाशमान वस्तु ही पूर्ण में स्थित पूर्…
  13. Verse 17हे श्रीरामचन्द्रजी, वस्तुतः सृष्टिरूप में स्थित होने पर भी आकाशकोश के सदृश शान्त एवं सत्य…
  14. Verse 18पत्थर के उदर के सद्रश ऐसा कहने से उसमें अप्रकाशस्वभावता की जो श्रान्ति हो रही हैं, उसका ख…
  15. Verse 19भविष्य में जिस नगर का नवीन निर्माण करना होता है, उसका पहले चित्त मेँ ही कल्पनारूप से अस्त…
  16. Verse 20जैसे संकल्प का नगर संकल्प से भिन्न नहीं है, वैसे ही यह जगत्‌ का आभास भी परमार्थरूप परब्रह…
  17. Verse 21जिसमें भविष्य में होनेवाली अनेक तरह की नूतन-नूतन रचनाएँ विद्यमान हैं ऐसे चौकोन (चतुष्कोण)…
  18. Verse 22यह निरन्तर नाश और उत्पत्ति से पूर्ण रहते हुए भी नाश और उत्पत्ति से वर्जित है, अनेक-सा भास…
  19. Verse 23हे श्रीरामजी, जब तत्त्वज्ञान हो जाता है, तब यह उदित सृष्टिरूप वस्तु उत्पत्ति-विनाश से रहि…