Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
सुरत्नजठराकारं घनमप्यम्बरोपमम् ।
प्रतिबिम्बमिव क्षुब्धमप्यक्षुब्धमसच्च सत् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
पत्थर के उदर के सद्रश ऐसा कहने से उसमें अप्रकाशस्वभावता की जो श्रान्ति हो रही हैं,
उसका खण्डन करते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, वह सुन्दर रत्नशिला के उदराकृति सदृश प्रकाशमय है, घन होने पर भी
आकाश की तरह है, जगत्-प्रतिविम्ब को पाकर क्षुब्ध-सा स्थित होने पर भी वस्तुतः वह अक्षुब्ध
है तथा जगद्-रूप से असत् प्रतीत होने पर भी वह सत्स्वरूप ही स्थित रहता है