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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

अकर्तृकर्मकरणमदृश्यद्रष्टृदर्शनम् । जगदग्राह्यसंभारमभित्तौ चित्रमुत्थितम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

वैशग्यश्रिद्धि के लिए अविद्यास्वभाव से ही शुद्ध ब्रह्म में जयत्‌-रूपी वित्र का अध्यास होता है; यह वर्णन करते हैं । कर्ता, कर्म तथा करण आदि सामग्री से शून्य, द्रष्टा, दर्शन एवं दृश्य आदि से रहित और उपादेय पदार्थों से शून्य यह जगत्‌-रूप चित्र बिना दीवार आदि आधार के ही आविर्भूत है