Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अस्वभावस्वभावोऽयं सर्वोऽहंतादिवेदनः ।
स्वभावैकस्वभावेन निर्वाणीक्रियतां स्वयम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, अविद्या -स्वभाव से युक्त हुआ यह आत्मा ही
सम्पूर्ण जगत् का रूप धरकर अहंकार आदि को जाननेवाला बन जाता है । इस तरह अनिर्वाण-
स्वरूप हुए इस आत्मा को आप स्वयं ही शास्त्रीय उपायों द्वारा उत्पन्न हुई विद्या से आविर्भूत
अद्वितीय, स्वप्रकाश पू्णानन्दस्वरूप आत्मा के स्वभाव से निर्वाण-स्वरूप बना दीजिये
सर्ग सन्दर्भ
चालीसवाँ सर्ग समाप्त इकतालीसर्वों सर्ग अविद्या के स्वभाव से त्रिलोकीरूपी कठपुतली के नृत्य तथा एकमात्र आत्मत्वभाव से निर्वाण की प्राप्ति का वर्णन।