Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
न चोत्थितं किंच न वा शान्ते शान्तं यथास्थितम् ।
अनामयं परं ब्रह्म सत्यमव्ययमेव तत् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
विद्या-स्वभाव से उस जयत्-रुपी चित्र का खण्डन करके अब निर्वाण का स्वरूप
दिखलाते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी जिस रूप से स्थित यह दृश्य चित्र है, वह ब्रह्म में न तो कभी कुछ उत्पन्न
ही हुआ और न शान्त ब्रह्म मे शान्त ही हुआ | असल में वह निर्विकार सत्य, अविनाशी
परब्रह्मरूप ही है