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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verses 7–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, verses 7–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 7-11

संस्कृत श्लोक

सर्वर्तुशेखरधरा दिग्बाहुलतिकाकुलाः । पातालपादलतिका ब्रह्मलोकशिरोधराः ॥ ७ ॥ चन्द्रार्कलोलनयनास्तारोत्करतनूरुहाः । सप्तलोकाङ्गलतिकाः परितोच्छाम्बराम्बराः ॥ ८ ॥ द्वीपाम्बुराशिवलया लोकालोकाद्रिमेखलाः । भूतभारचलज्जीवप्रवहत्प्राणमारुताः ॥ ९ ॥ वनोपवनविन्यासहारकेयूरभूषिताः । पुराणवेदवचनाः क्रियाफलविनोदनाः ॥ १० ॥ त्रिजगत्पुत्रिकानृत्यं यदिदं दृश्यते पुरः । ब्रह्मवारिद्रवत्वं तत्तद्ब्रह्मानिलवेपनम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

भौतिक शरीरो के धारण-पोषण आदि निमित्त से चल-फिर रहे जीव ही इनके बह रहे प्राण मारूत हैं, वन तथा उपवनों की विचित्र रचनारूपी हारों ओर केयूरो से ये खूब भूषित हैं, पुराण और वेद ही तो इनके वचन हैं तथा तत्‌-तत्‌ क्रियाओं के फलरूप सुख और नानाविध दुःख ही इनके विलास हैं। हे श्रीरामजी, इस तरह की त्रिलोकीरूपी पुतलियों का जो नृत्य आपके सामने दिखाई दे रहा है वह ब्रह्मरूपी जल का द्रवत्व या ब्रह्मरूपी वायु का संचलन ही है