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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

असुषुप्तसुषुप्तस्थः स्वभावं भावयन्भव । जाग्रत्यपि गतव्यग्रो मा स्वप्नमिदमाश्रय ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह अविद्या के स्वभाव का वर्णन करके अब ब्रह्मात्मेक्यस्वथाव से निर्वाणरुप बनाने में उपाय बतलाते हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, सांसारिक व्याकुलता छोड़कर आप पारमार्थिक स्वभाव की भावना करते हुए, जाग्रत्‌काल में भी असुषुप्त-सुषुप्त पद में यानी अज्ञान के नाश से असुषुप्तरूप तथा सम्पूर्ण द्वैत का उपसंहार से सुषुप्तरूप जो तुर्यपद है उसमें स्थित हो जाइये, इस जगद्रूप स्वप्न का आश्रय मत कीजिये