Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 35
चौंतीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतीसवाँ + पैतीसवों सर्ग प्रपंचसहित तथा प्रपंचरहित ब्रह्मतत्व की अखण्ड एक दृष्टि के लिए सत्य ओर असत्य दोनों तरह के भासमान ब्रह्म के स्वरूप का विस्तारपूर्वक वर्णन |
40 verse-groups
- Verse 1विरोधाभाग्रोक्तियों से सश्चन्ध और अक्षुब्ध दो रूपों से युक्त ब्रह्म का विस्तारपूर्वक वर्ण…
- Verse 2हे श्रीरामजी, निरामय होने के लिए यानी निर्वाणपद की प्राप्ति के लिए चलते, सुनते, स्पर्श कर…
- Verse 3जीवन्मुक्तों की स्थिति तथा अपने कुल के आचार के अनुसार सब व्यवहार करते हुए उसी निराभास, सत…
- Verse 4आगे कही जानेवाली बातो में उपयोगी होने के कारण उम्र विद्या के विरुद्ध अविद्या का निरूपण कर…
- Verse 5अविद्या के न रहने से चिति और चेत्य (विषय) के भेद का संभव कहाँ ? और भेद न रहने से वह चिति…
- Verse 6विद्या और अविद्या दोनों से मिले-दुले रहने के कारण मध्य की भूमिका में आरूढ विवेकी फुरुष की…
- Verse 7अशून्य होने पर भी प्रलय में शून्य के समान तथा शून्य होने पर भी सृष्टि-काल में अशून्य के स…
- Verse 8विकारशून्य होने पर भी वह विकारी के समान, शान्त ओर समरूप होने पर भी वह अज्ञान के कारण अशान…
- Verse 9विभागशून्य होने पर भी वह भागसहित के तुल्य, जाड्यरूपता को न प्राप्त होने पर भी वह जड़ के स…
- Verse 10अहंकाररहित होने पर भी अहंकारसहित के समान, अविनाशी होने पर भी नाशवान् के सदृश, कलंकशून्य…
- Verse 11स्वप्रकाश होने पर भी सघन अन्धकारयुक्त के समान, पुरातन होने पर भी नवीन के समान, परमाणु से…
- Verse 12सर्वात्मक होने पर भी जिसने यज्ञ, दान, तप, चित्तशुद्धि, वैराग्य, श्रवण, मनन आदि महान् कष्…
- Verse 13मायारहित होने पर भी जो मायारूपी किरणसमूह का निर्मल सूर्य है । जलों के स्वामी सागर की नाई…
- Verse 14ब्रह्माण्डात्मना जगद्रूप रत्नों का महाकोश अर्थात् अत्यन्त वजनदार होने पर भी विवेक की तरा…
- Verse 15काल और देश से अनन्त तथा अपार होने पर भी कहीं एक नियत स्थानपर स्थित न रहनेवाला एवं शून्यस्…
- Verse 16अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थों में वह अत्यन्त सूक्ष्म है, स्थूल पदाथों में वह सबसे अत्यन्तस्थूल…
- Verse 17कर्ता, कर्म और करण से रहित, कारणशून्य, कारक तथा अन्तःशून्य होने के कारण ही यह ब्रह्म चिरक…
- Verse 18जगद्रूपी रत्नों की पिटारी होने पर भी नित्य जंगल के समान शून्य तथा अनन्त पर्वतों के तुल्य…
- Verse 19प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक कालस्वरूप होने पर भी प्रायः सबसे रहित, पुराण होने पर भी कोमल…
- Verse 20प्रत्यक्ष होने पर भी वह इन आँखों से दुर्लक्ष्य तथा परोक्ष होने पर भी वह साक्षीरूप से सामन…
- Verse 21अनहंभाव (युष्मदर्थ का विषय) होने पर भी अहंभावरूप तथा अहंभावरूप से भासित होने पर भी वह अनह…
- Verse 22इस परिपूर्णं चिद्-रूप सागर के भीतर ये त्रिभुवनरूपी तरे द्रवतारूप स्वभाव से स्फुरित हो रह…
- Verse 23जैसे तुषार अपने अंग में शुक्लता धारण करता है, वैसे ही यह चेतन स्थावर-जंगमात्मक सारी सृष्ट…
- Verse 24देश-कालादि के अवयवों से रहित भी यह चिद्रूप देव- रात-दिन असद्रूप जगत् का ऐसे विस्तार करता…
- Verse 25इस विस्तृत आकाशरूपी जंगल में प्रसार को प्राप्त हो रहे पंचभूतरूप पत्तों के सहित ये जगद्रूप…
- Verse 26अत्यन्त निर्मल आकारवाला चिद्रूप यह परमात्मा स्वयं अपना प्रतिबिम्ब (वर्णित जीवजगत् स्वरूप…
- Verse 27अपरिच्छिन्न ब्रह्मसंवित् में आकाशरूपी गूलर के वृक्ष के फल के सदुश इस ब्रह्माण्ड के अपनी…
- Verse 28वह परमात्मा ही भीतर स्थित वासनामय प्रपंच से बाहर स्थित जगत्स्वरूप से, जाग्रत्-स्वप्न मे…
- Verse 29अब इसीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं / इस चितिरूप आत्मा में इस चिति की ही इच्छा से चितिर…
- Verse 30इस चितिरूपी जल का जो द्रवत्व है वही यह जगत् है, जिस जगत् के संवित् से ही स्वादपूर्वक उ…
- Verse 31सूर्य, चन्द्र, अग्निकण आदि सभी प्रकाशों की रूपादि पदार्थशोभा इसी चितिरूपी सूर्य में सुषुप…
- Verse 32तुषार में शुक्लता की नाई यह ब्रह्म ही सम्पूर्णं जगत् है । अतः इसी चितिरूपी ब्रह्म से ये…
- Verses 33–34इसी निरवयव चितिरूप रंग से चित्रित यह सम्पूर्ण जगत्स्वरूप चित्र स्थित है इसलिए हे श्रीरामज…
- Verse 35दृश्यरूपी नदी बह रही है। हे श्रीरामजी, आप इसमें तनिक भी सन्देह न कीजिये
- Verse 36इसी चिदाकाशरूपी रंगभूमि में भुवन की रचनारूप अभिनय के भ्रमों से युक्त निरन्तर कार्यारम्भ क…
- Verse 37जिसके नेत्रो के उन्मेष और निमेष में अनेक ब्रह्माण्डों के महाप्रलय ओर अवान्तर प्रलय हुआ कर…
- Verse 38उत्पन्न हो रहे अनेक ब्रह्माण्डों के रहते हुए भी यह चिद्-रूपी परमात्मा इच्छादि विकारों से…
- Verse 39जैसे भौतिक सृष्टियों के कारण पंचभूत हैं, वैसे ही स्वयं कारणशून्य यह चिद्-रूप परमात्मा भू…
- Verse 40इस परब्रह्म परमात्मा का उन्मेष ही जगत् का सौन्दर्य है तथा निमेष ही प्रलय का आगम है । हे…
- Verse 41परिणामतः महान होते हुए भी जो काल, देश और वैभव आदि से भी महान् हैं उन अनेक महामहाब्रह्माण…