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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

प्रत्येकं प्रत्यहं प्रायः पुराणं पेलवं नवम् । आलोकमन्धकाराभं तमस्त्वालोकमाततम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक कालस्वरूप होने पर भी प्रायः सबसे रहित, पुराण होने पर भी कोमल और नूतन, स्वयंप्रकाशस्वरूप होने पर भी अन्धकार के सदृश तथा जगत्‌ का तिरोभाव करनेवाला होने के कारण अन्धकारस्वरूप होने पर भी स्वयंप्रकाश सर्वत्र व्याप्त वह ब्रह्म स्थित है