Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
जगत्समुद्गकमपि नित्यं शून्यमरण्यवत् ।
अनन्तशैलकठिनमप्याकाशलवान्मृदु ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जगद्रूपी रत्नों की पिटारी होने पर
भी नित्य जंगल के समान शून्य तथा अनन्त पर्वतों के तुल्य कठिन होने पर भी आकाश के लेश से
भी बढ़कर कोमल वह ब्रह्म स्थित है