Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
अस्योन्मेषो जगल्लक्ष्मीर्निमेषः प्रलयागमः ।
अनुन्मेषनिमेषोऽसावात्मन्येवावतिष्ठते ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
इस परब्रह्म परमात्मा का उन्मेष ही जगत् का सौन्दर्य है तथा
निमेष ही प्रलय का आगम है । हे श्रीरामजी, सच पूछिये तो, जिसके उन्मेष ओर निमेष वस्तुतः
एक-से हैं वह परब्रह्म परमात्मा अपने स्वरूप में ही अवस्थित रहता है