Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
सत्यं ब्रह्म जगच्चैकं स्थितमेकमनेकवत् ।
सर्वं वाऽसर्ववद्भाति शुद्धं चाशुद्धवत्ततम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
विद्या और अविद्या दोनों से मिले-दुले रहने के कारण मध्य की भूमिका में आरूढ विवेकी
फुरुष की दृष्टि से नियत एक रुपवाला होते हुए भी वह ब्रह्म अनियत-विरुद्ध नाना स्वभाव से
युक्त-स्रा स्थित रहता हैं. इस तरह के अनेक विरोधाभास तथा प्रमाण, युक्ति ओर अनुभव आदि
से सर्गा समाप्ति पर्यन्त उसका विस्तृत वर्णन करते हैं ।
ब्रह्म ओर जगत् परमार्थतः एक ही है, परन्तु अज्ञान के कारण अनेक-सा यानी विरुद्ध रूप से
स्थित भासता है एवं सर्वत्रव्याप्त, परिपूर्ण और शुद्ध होने पर भी ब्रह्म अपूर्णं और अशुद्ध-सा
अज्ञान के कारण ही भासता है