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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अविद्यासंभवाच्चेत्यचित्त्वे संभवतः क्व किम् । चेत्यते कथमेवान्तः शान्तिरेव बलोदिता ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

अविद्या के न रहने से चिति और चेत्य (विषय) के भेद का संभव कहाँ ? और भेद न रहने से वह चिति अपने भीतर किस को कैसे प्रकाशित करे ? इसलिए विचारकर देखने से यही प्रतीत होता है कि शान्त, विषयशून्य चिन्मात्रस्थिति ही बलात्‌ उदित है