Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 215
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- Verse 1ढो सौ तेरहवाँ सर्म समाप्त दो सौ चोदहवाँ सर्ग॑ श्रीवसिष्ठजी के उपदेश की प्रशंसा, श्रोता लो…
- Verses 2–5उस पुष्पवृष्टि का लाल लाल केसरपुंज ही सन्ध्याकाल के मेघो के समान लाल अंगराग था, फूलों के…
- Verse 6महाराज दशरथ ने कहा : भगवन्, आपके उपदेश से हमारा आत्मा परम पद में सुख से प्रवेश पाने योग्…
- Verse 7हे मुनिवर, आपके अनुग्रह से आज हमारे पुरुषार्थ की सिद्धि के लिये अवश्य कर्तव्यकर्म की अवधि…
- Verses 8–13ध्यान से कल्पित अन्य आकाश में चिरकाल तक विहार आदि की अनुभूति के भ्रमों से, जिनका कि लीलोप…
- Verses 14–17श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, हे गुरुवर, आपके अनुग्रह से मेरा अज्ञान नष्ट हो ग…
- Verse 18अहा ! असीम विश्रान्तिसुख भूमि मुझे मिल गई है । जन्म, मरण आदि अनन्त अनर्थो से व्याप्त संसा…
- Verse 19लेकिन अव मेरे दुःख के कोई भी कारण नहीं रह गये हैं, ऐसा कहते हैं। भगवन्, न मेरा कोई शत्रु…
- Verses 20–21हे भगवन्, आपके अनुग्रह के बिना इस दृष्टि को मनुष्य केसे जान सकता है ? भला बतलाइये तो सही…
- Verse 22भगवन्, आपके सदृश महानुभावं के उपदेश से इस प्रकार की निरतिशय आनन्दप्रकाशरूप आत्मदृष्टि के…
- Verse 23श्रीविश्वामित्रजी ने कहा : अहा ! हमारे लिए बड़े हर्ष की बात है कि हमने मुनि महाराज के श्र…
- Verse 24श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : सम्पत्तियां के उत्कर्ष मे आत्मा चरमसीमा देखा गया है, क्योंकि वह…
- Verse 25देवर्षि श्रीनारदजी ने कहा : अहा ! जो उत्तम तत्त्व ब्रह्मलोक में सुनने को नहीं मिला, जो स्…
- Verse 26श्रीलक्ष्मणजी ने कहा : हे मुनिवर, हमारे हृदय का तथा बाहर का अज्ञानान्धकार निःशेष निवृत्त…
- Verse 27श्री शत्रुघ्नजी ने कहा : भगवन्, आपके अनुग्रह से मैं निगतिशयआनन्दरूप जीवन्मुक्ति को प्राप…
- Verse 28महाराज दशरथ ने कहा : अनेक जन्मों के संचित पुण्यो से परमज्ञानी मुनिश्रेष्ठ इन कुलगुरु महार…
- Verse 29श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे भरद्वाज, जब राजा दशरथ के साथ सभा स्थित वे सभ्यगण इस प्रकार के…
- Verses 30–35अब महामुनि श्रीवसिष्ठजी मंगलादीनि मंगलमध्यानि म॑गलान्तानि शास्त्राणि प्रथन्ते वीरपुरूषकाण…
- Verses 36–39सुन्दर राजमहल में तथा खूब सजाये गये अतएव सुमेरु सदृश अयोध्या नगरी में विलासवती यौवनमत्त क…
- Verses 40–46उस नाच में बाँसुरियाँ, कांस्यताल, वीणा, पखावज, तबले आदि बज रहे थे, ताण्डव नृत्य से जोर की…
- Verse 47राजा दशरथ के उत्सवरूपी यज्ञ में रंग बिरंग के कपड़े पहने हुए तथा उत्तम उत्तम माला धारण किय…
- Verse 48ताण्डव नृत्य करनेवाली स्त्रियाँ कपूर, अगरू, कस्तूरी और कंकोलमिर्च मिश्रित चन्दन लगाकर खूब…
- Verse 49महाराज दशरथ ने अविनाशी परमपद को प्राप्त होकर बोधरूपी सूर्योदय हो जाने के कारण संसाररूपी क…