Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 19
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
लेकिन अव मेरे दुःख के कोई भी कारण नहीं रह गये हैं, ऐसा कहते हैं।
भगवन्, न मेरा कोई शत्रु है न मित्र हे, न मेरा शरीर है ओर न बाहरी खेत है, न दुर्जन है ओर न
सज्जन है । यह आत्मचिति ही जब तक दुर्बोध थी यानी समझ में नहीं आती थी तब तक दुःखदायिनी
यह जगत्रूप हुई किन्तु इस समय तो जगत् का ज्ञान से बाध होने के कारण यह सवर्थ सुन्दर हो गई
है