Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 26
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीलक्ष्मणजी ने कहा : हे मुनिवर, हमारे हृदय का तथा बाहर का अज्ञानान्धकार निःशेष निवृत्त
कर चुके आपने हम लोगों के सन्मुख यह सिद्ध कर दिया है कि आप प्रसिद्ध सूर्य की अपेक्षा कई गुना
अधिक उत्कृष्ट सूर्य हो गयं है, क्योकि सूर्य केवल बाहर का ही अन्धकार निवृत्त करता है वह भी
उससे आत्यन्तिक निवृत्त नहीं होता किन्तु आपने भीतर बाहर के अन्धकार की आत्यन्तिक निवृत्ति
कर दी है