Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verses 40–46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, verses 40–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 40-46

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

उस नाच में बाँसुरियाँ, कांस्यताल, वीणा, पखावज, तबले आदि बज रहे थे, ताण्डव नृत्य से जोर की ध्वनि हो रही थी। उन नाच करनेवाली महिलाओं के शेखर परस्पर विलक्षण केशबंधन के विभिन्‍न आभूषणों से विरचित थे, इधर उधर नचाये गये विविध अभिनय करनेवाले हाथों के भ्रमणों से उनके आसपास का आकाश तथा उनके वस्त्र पल्लवित से लगते थे, हास्यरस के अभिनय के समय वे दन्तरूपी चन्द्रमा की शुभ्र रश्मियाँ मनोहर अट्टाहासों द्वारा चारों ओर बिखेरती थीं, वीर रस के अभिनय के समय मंदपूर्वक हकार करती थीं, करुण, अद्भुत आदि रसों के अभिनय की लीलाओं के अवसर पर उनका स्वर चंचल हो उठता था, श्रृंगार रस में मानके अभिनय के अवसर पर वे एक पैर के तलुवे से लीलापूर्वक धरातल पर आघात करती थीं, मोतीमालाओं या पुष्पमालाओं के फटकारने से नक्षत्रों की तरह बिखर रहे पुष्पों की वृष्टियों से वे सफेद थीं, जलधारा के समान गिराये गये टूटे हुए हारों पर दैवात्‌ पैर रखने से उनके पैर फिसल जाते थे। अपने चंचल आभरणों से कामदेव को मूर्तिमान्‌ सा दिखला रही उन ललनाओं ने जी भर कर नाच किया ब्राह्मणों ने वेदपाठ किया, वन्दियों ने स्तुतिपाठ किया और उन स्त्रियों ने गीत गाये। उनमें से जो आसव आदि मादकद्रव्य का सेवन करनेवाले द्विजेतर थे उन्होंने आसव आदिका पान किया किन्तु वस्त्र, आभूषण आदि से विभूषित भोजनार्थी विप्रों ने भोजनयोग्य विविध प्रकार के भक्ष्यों के वैचित्रय से युक्त चार प्रकार का अन्न ग्रहण किया । चूना आदि की पुताई से स्वच्छ बनाई गई गृहभित्तियाँ रामरूपी चन्द्रमा की देहकान्तिरूप चाँदनी से तथा पुष्पोपहार, धूप, अन्योन्य रंगों के लेप से खूब चमक उठीं