Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verses 14–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, verses 14–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 14-17
संस्कृत श्लोक
इमां पुरा मोक्षमयीं विचार्य सुसंहितां सद्वचनाद्विरिञ्चः ।
प्रयुक्तवानेतदचिन्त्यरूपो भवन्त्यसत्याश्च न तस्य वाचः ॥ १४ ॥
मोक्षाभ्युपायाख्यकथाप्रबन्धे याते समाप्तिं सुधिया प्रयत्नात् ।
सुवेश्म दत्त्वाभिमतान्नपानदानेन विप्राः परिपूजनीयाः ॥ १५ ॥
देयं च तेभ्यः खलु दक्षिणादि चित्तेप्सितं स्वस्य धनस्य शक्त्या ।
मत्वानुरूपं कृतमेव सङ्गपुण्यं यथाशास्त्रमुपैत्यसौ तत् ॥ १६ ॥
एतत्ते कथितं कथाक्रमशतैर्बोधाय बुद्धैर्वृहच्छास्त्रं बृंहितब्रह्मतत्त्वममलं दृष्टान्तयुक्त्याञ्चितम् ।
श्रुत्वैतच्चिरनिर्वृतिं भज भृशं जीवद्विमुक्ताशयो लक्ष्मीं ज्ञानतपःक्रियाक्रमयुतां भुक्त्वाऽक्षयामक्षयः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, हे
गुरुवर, आपके अनुग्रह से मेरा अज्ञान नष्ट हो गया है, मुझे परमपद प्राप्त हो गया है, मैं अत्यन्त निर्मल
बुद्धि हो गया हू । मेरे सब सन्देह निवृत्त हो चुके हैं, मेरे अज्ञान का पर्दा हट गया है, में स्वभावभूत
(स्वात्मरूप) ब्रह्म में स्थित हूँ जैसे आपने मुझे यथाप्राप्त व्यवहार-राज्य पालन आदि - करने के लिये
कहा है वैसे ही मैं आपका आदेश पालन करूंगा । अमृत से सीचने के तुल्य परमसुख देनेवाले आपके
(&) सबसे ऊँचे स्थान में श्रीवसिष्ठजी विराजमान थे | उनके समीप में अन्यान्य मुनिगण, इनके
निकट महाराज दशरथ, राजकुमार रामचन्द्र आदि, उनके निकटवर्ती निम्न स्थान में मन्त्री, सामन्त
आदि तथा उनके बाद सर्वसाधारण श्रोताजन यों क्रम से नीचे बैठे हुए थे।
वचन का बारबार स्मरण कर पूजे जाने तथा अपमानित होने पर हर्ष, विषाद आदि का उदय न होने से
शान्त हुआ भी मैं बार बार हर्षित-सा होता हू । आज मेरा यहाँ न तो कर्म से कोई प्रयोजन है ओर न
अकृत से (ज्ञान से) कोई प्रयोजन है फिर भी जैसे पहले व्यवहार में स्थित था वैसे ही स्थित हूँ लेकिन
व्यवहार मे प्रसक्ति से होनेवाला सन्ताप मुझमें बिलकुल नहीं हे