Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 24
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : सम्पत्तियां के उत्कर्ष मे आत्मा चरमसीमा देखा गया है, क्योंकि वह
निरतिशय आनन्दरूप है, दुष्टियों की चरमसीमा आत्मदृष्टि देखी गयी है, क्योंकि एक के ज्ञान से सर्व
का ज्ञान हो जाता है, शास्त्रों की चरमसीमा अध्यात्मशारत्र देखा गया हे, क्योंकि वही चरम प्रमाण हे ।
पशु, पुत्र, धन आदि के विनाशरूप विपदाओं की चरमसीमा सर्वसंसारनाश देखा गया हे, क्योकि
उसके बाद फिर दूसरा नाश नहीं हो सकता हे । काव्य, रस, अलंकार आदि से शोभित वाणियों की
चरमसीमा श्रीवसिष्ठजी महाराज की उपदेशोक्ति देखी गई है तथा दृष्ट सुख विश्रान्ति के कारण
महल, बाग-बगीचा, पर्वत, नदी, बालूमय तटभूमि आदि प्रदेशों की चरमसीमा परमात्मरूप प्रदेश देखा
गया है, क्येकि वही परम विश्रान्ति हेतु है