Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verses 2–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, verses 2–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 2-5
संस्कृत श्लोक
एतामेव दृशं कान्तामवष्टभ्य यथासुखम् ।
नीरागस्तिष्ठ निःशङ्को जीवन्मुक्तः प्रशान्तधीः ॥ २ ॥
धीरनभ्यस्तसङ्गा हि रामादीनामिवानघ ।
घनमोहनिमग्नापि विमूढापि न मुह्यति ॥ ३ ॥
एवमेते महासत्त्वा जीवन्मुक्तपदं गताः ।
राजपुत्रा राघवाद्या राजा दशरथादयः ॥ ४ ॥
त्वं च पुत्र भरद्वाज स्वयमेवासि मुक्तधीः ।
सत्यं मुक्ततरोऽस्यद्य श्रुत्वेमां मोक्षसंहिताम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
उस पुष्पवृष्टि का लाल लाल केसरपुंज ही सन्ध्याकाल के मेघो के समान लाल अंगराग
था, फूलों के अन्दर से निकले हुए कोमल कोमल जलकण ही शीतल अंग थे तथा वायु से हिलाये डुलाये
गये सफेद केसर ही स्वच्छ मोती के हार थे, अतएव ऐसा मालूम पड़ता था कि मानों उत्सव देखने के
लिए साक्षात् पुण्य-लक्ष्मी ही पुष्पवृष्टि के रूप में स्वर्ग से उतरी है। आकाशस्थित उक्त पुष्पवृष्टि
प्रलयकालरूपी बन्दर द्वारा झकझोरी गई सूखी कल्पवृक्षशाखावाले ओर लोकपालों के नगर और भिन्न
भिन्न लोकरूप शाखावाले स्वर्गरूप वृक्ष से शीघ्र भूमि में गिरे हुए खूब चमकते हुए सितारों का जिन्हें
गिराने के लिए दिशाओं के मुखों की ओर संहाररुद्र शीघ्र झपटे, मन्द-मन्द मुसकुराहट के साथ परिहास
कर रही थी यानी वह तारों के समान पूर्ण चमक-दमकवाली थी दर्शन से आनन्द का विस्तार करनेवाली
वह पुष्पवृष्टि थोड़ी देर मे शान्त हो गई, जिसका दुन्दुभि की ध्वनि से गरज रहा केसरपुंज ही मेघ था
तथा जिसने हिम के समान मनोहर पुष्पराशि से सम्पूर्ण सभा भर दी थी । स्थान के अनुसार (4) क्रम से
नीचे बैठे हुए सभासदों ने उन दिव्य फूलों को लेकर वसिष्ठजी के चरणों में पुष्पांजलि देकर वसिष्ठजी
को नमस्कार कर फूलों की सुगन्धि, शीतलता आदि के सम्पर्क से स्वेद, दुर्गन्ध आदि से जनित शोकवत्ता,
रोग, भूख, प्यास, श्रम आदि से हुई सशोकता (दुःख) ओर जन्म, मरण आदि सकल क्लेशो से छुटकारा
पाया