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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verses 20–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 20,21

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

हे भगवन्‌, आपके अनुग्रह के बिना इस दृष्टि को मनुष्य केसे जान सकता है ? भला बतलाइये तो सही पुल अथवा जहाज के बिना ही बालक समुद्र को कैसे पार कर सकता है ? श्रीलक्ष्मणजी ने कहा : अहा, अनन्त जन्म जन्मान्तरों में बढी चढी दुर्वासनाओं के कारण उत्पन्न हुए सन्देहो का नाश करनेवाले तथा अनेक जन्मजन्मान्तरों मे संचित सैकड़ों पुण्यो को फलोन्मुख बनानेवाले मुनि महाराज के उपदेश से किये गये प्रतिबोधन से विचार के लिए उद्यमशील मेरे मन में आज चन्द्रमा के तुल्य परम आह्लाद देनेवाला परमात्मप्रकाश हो गया है