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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 204

दोसौ ढोवाँ सर्ग समाप्त दोसौ तीनवाँ सर्ग मध्याहकाल का सूचक तुरी का घोष, दिनचर्या, निशा का आगमन तथा प्रातःकाल सभा के सामने श्रीरामचन्द्रजी के सन्देह अभाव का वर्णन ।

14 verse-groups

  1. Verses 1–5श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : इस प्रकार जब भगवान्‌ वसिष्ठजी तथा श्रीरामचन्द्रजी आपस में विचार क…
  2. Verses 6–15मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि की मुखकान्तिरूप चन्द्रमा से विकसित से हुए अपने कुल के…
  3. Verses 16–20महाराज दशरथ सब सामन्तो, भूपालों, अपने अंगरक्षक, चाकर आदि, महामुनि वसिष्ठ तथा श्रीरामचन्द्…
  4. Verses 21–23अव आपको गुरू के उपदेश, वेदान्त आदि शास्त्र तथा स्वानुभव के अविसंवादके लिए एकार्थनिष्ठतारू…
  5. Verses 24–29श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी के यह कहने पर श्लाघनीय धर्मात्मा महाराज दशरथ…
  6. Verses 30–33वह त्वरायुक्त सभा से उठने का समय अत्यन्त सुशोभित हुआ जिसमें घुटनों तक देवताओं द्वारा वर्ष…
  7. Verses 34–35मृदु-मधुर वचनवाले सत्कृत दशरथ आदि सब सज्जन पुरुष, जो सातों लोकं के निवासी थे, परस्पर पूछक…
  8. Verse 36क्रमानुसार प्रेम से एक दूसरे को सत्कार कर उनसे विदा लेकर अपने घर में आकर उन्होने दिन का क…
  9. Verses 37–39इसके पश्चात्‌ श्रीवसिष्ठ आदि तथा दशरथ आदि राजा-सबने दिवस के कृत्य किये | इसके अनन्तर उनके…
  10. Verse 40प्रातःकाल घर में झाड़ू बुहारी देने की तरह अन्धकाररूपी पांसु तारा रूपी फूलों की राशियाँ जि…
  11. Verses 41–45इसके अनन्तर करवीर और कुसुम्ब के सदृश किरणों से दिशाओं को लाल बना रहे बाल सूर्य आकाशरूपी स…
  12. Verses 46–47श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे सकल धर्मो के ज्ञाता, हे सकल ज्ञानो के महासागर, हे सकल सन्देहर…
  13. Verses 48–49श्रीवसिष्टजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी आपको बोध प्राप्त हो गया है आपके लिए अब श्रोतव्य…
  14. Verses 50–52श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, जैसा आप कहते हैं वैसे ही मैं अपने को कृतकृत्य समञ्…