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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, Verses 21–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, verses 21–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 204 · श्लोक 21-23

संस्कृत श्लोक

एवंस्वभाव एवायं चिद्धातुर्गगनात्मकः । यदेवं नाम कचति निष्कारणगुणक्रमम् ॥ २१ ॥ न चैतद्व्यतिरेकेण किंचिन्नापीह विद्यते । अन्यच्छून्यत्ववारिभ्यामृते खार्णवयोरिव ॥ २२ ॥ न तु चिद्गगनादन्यन्न संभवति किंचन । इदं त्वमहमित्यादि तस्मादाशान्तमास्यताम् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

अव आपको गुरू के उपदेश, वेदान्त आदि शास्त्र तथा स्वानुभव के अविसंवादके लिए एकार्थनिष्ठतारूप एकवाक्यता करनी चाहिये, ऐसा कहते है । हे राम, जिस प्रकार मैंने आपको उपदेश दिया हे, जिस प्रकार आपने वेदान्तशासत्रों से जाना है ओर जैसा आपका अपना अनुभव है उस प्रकार सबकी एकवाक्यता कीजिये । हे महामते, यथाप्राप्त कर्तव्य का पालन करने के लिए आप उदिये | हम लोग मध्याहस्नान के लिए जाते हैँ । यह हम लोगों का मध्याह्न का समय व्यतीत हो रहा हे । हे भद्र, अपनी आकांक्षा की विनिवृत्ति के लिए आपको जो सुन्दर वस्तु पूछनी हो वह प्रातः काल आप पुनः पूछ लीजियेगा