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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, Verses 1–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, verses 1–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 204 · श्लोक 1-5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः । आदर्शो राजतेऽत्यर्थं पौनःपुन्येन मार्जितः ॥ १ ॥ अर्थो वेदनसंकेतः शब्दो जलरवोपमः । दृश्यमेतच्चिदाभानं स्वप्नवत्क्वाभवज्जगत् ॥ २ ॥ जाग्रद्वै स्वप्नसंदृष्टः स्मरणात्म स्थितं पुरः । संविद्वेदनमात्रं सत्तदन्याकारवत्ततम् ॥ ३ ॥ यथाच्छं संविदाकाशं मयि स्वप्नपुरात्मकम् । सरूपमपि नीरूपं तथेदं भुवनत्रयम् ॥ ४ ॥ श्रीराम उवाच । संपन्नेयं कथं भूमिः संपन्ना गिरयः कथम् । कथं संपन्नमम्भश्च संपन्ना उपलाः कथम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : इस प्रकार जब भगवान्‌ वसिष्ठजी तथा श्रीरामचन्द्रजी आपस में विचार कर रहे थे उस समय मानों उनके विचारविमर्श को सुनने के लिए भगवान्‌ सूर्य आकाश के मध्य में पहुँचे । इसके पश्चात्‌ दसों दिशाओं में प्रकाश श्रीरामचन्द्रजी की महामति के समान पदार्थ-राशि स्पष्टरूप से प्रदर्शन के लिए जल्दी तेज हो गया । उस समय उद्यान के तालाब विकसित कमलों से विशालकाय होने के कारण प्रफुल्ल-हृदय कमल होने के कारण विकसिताकार वहाँ पर बैठे हुए राजाओं की तरह खूब सुशोभित हुए । मोतियों की घनी झालरवाला स्फटिकमणि का झरोखा जिसमें भगवान्‌ सूर्य का प्रतिबिम्ब संक्रान्त था, आकाश में तैरता हुआ-सा नाचता था। पद्मराग मणियों में संक्रान्त सूर्य की आकाश में फैली हुई तेजदीप्तिवाली किरणे (प्रतिबिम्बित-कान्तियाँ) ऐसी स्फुरित होती हैं जैसे कि स्वच्छ उपदेश ज्ञानकला स्फुरित होती हैं

सर्ग सन्दर्भ

दोसौ ढोवाँ सर्ग समाप्त दोसौ तीनवाँ सर्ग मध्याहकाल का सूचक तुरी का घोष, दिनचर्या, निशा का आगमन तथा प्रातःकाल सभा के सामने श्रीरामचन्द्रजी के सन्देह अभाव का वर्णन ।