Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, Verses 16–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, verses 16–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 204 · श्लोक 16-20
संस्कृत श्लोक
वस्तुतस्तु न भूम्यादि किंचित्तन्न च दृश्यता ।
चिदाकाशमनन्तं तत्सर्वमेकं तदात्मकम् ॥ १७ ॥
द्रवत्वादम्बु हृद्याब्धेर्नानावृत्तितया यथा ।
अनानैव भवेन्नाना चिद्व्योमात्मनि वै तथा ॥ १८ ॥
काठिन्यवेदनादुर्वी गिरितामागतेव चित् ।
शून्यतावेदनाच्छून्यं वेत्ति व्योमेव चिद्वपुः ॥ १९ ॥
द्रवत्ववेदनाद्वेत्ति वारि स्पन्दतयानिलम् ।
औष्ण्यसंवित्ततो वह्निमत्यजन्ती निजं वपुः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज
दशरथ सब सामन्तो, भूपालों, अपने अंगरक्षक, चाकर आदि, महामुनि वसिष्ठ तथा श्रीरामचन्द्रजी के
साथ सभा से उठे। सब राजा, राजकुमार, मन्त्रिगण, मुनिवृन्द परस्पर पूजा-सत्कार पाकर बड़ी प्रसन्नता
के साथ अपने अपने घर को गये । अन्तःपुर के प्रमुख गृहों में पंखों की वायु से उड़ाई गई कपूर की धूलि
से अपूर्वं ही मेघमाला उदित हुई | इसके पश्चात् मध्याहकाल की तूरियों की ध्वनि दीवारों मेँ टकराकर
प्रतिध्वनित हुई तब वाक्यप्रयोग में निपुण मुनिश्रेष्ठ श्रीवसिष्ठजी ने ये वाक्य कहे : हे रामचन्द्रजी,
आपने श्रोतव्य सब कुछ सुन लिया है ओर ज्ञातव्य सब कुछ जान लिया है इसके अतिरिक्त उत्तम
ज्ञातव्य कुछ भी नहीं हे