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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, Verses 50–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, verses 50–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 204 · श्लोक 50-52

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, जैसा आप कहते हैं वैसे ही मैं अपने को कृतकृत्य समञ्जता हूँ, मैं निर्वाण को प्राप्त हो चुका हूँ, प्रशान्त हो चुका हूँ, मुझमें किसी बात की आकांक्षा नहीं हे । जो कुछ वक्तव्य था उसे आप कह चुके हैं, मैं सम्पूर्ण ज्ञातव्य वस्तु जान चुका हूँ अब कृतकृत्यता को प्राप्त हुई आपकी वाणी विश्राम को प्राप्त हो । मैं जानने योग्य तत्त्व को जान चुका हूँ, यह ज्ञातव्य वस्तु मुझे मिल गई है । सम्पूर्ण जगत्‌ ऐक्य को (ब्रह्मैकरसता को) प्राप्त हो चुका है । जीव ब्रह्म भेदरूपी द्वैत अस्त को प्राप्त हो गया है मेरा दृश्यभेद का भान मिट गया है क्योकि मैंने खूब विचारविमर्श कर सारी सांसारिता की आस्था का त्याग कर दिया है