Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, Verses 24–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, verses 24–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 204 · श्लोक 24-29
संस्कृत श्लोक
त्वं यथास्मिन् गृहे कुर्वन्नग्निशैलादिकां विदम् ।
तदेव पश्यस्यवपुरेवं चिद्गगनं तथा ॥ २४ ॥
चिद्व्योम भाति देहाभं सर्गादौ न तु देहकः ।
अकारणत्वादसतश्चिदुदेतीति चिन्त्यताम् ॥ २५ ॥
मनोबुद्धिरहंकारो भूतानि गिरयो दिशः ।
शिलाजठरवन्मौनमयं सर्वे यथास्थितम् ॥ २६ ॥
एवं न किंचिदुत्पन्नं नष्टं न च न किंचन ।
यथास्थितं जगद्रूपं चिद्ब्रह्मात्मनि तिष्ठति ॥ २७ ॥
चितौ यत्कचनं नाम स्वरूपप्रविजृम्भणम् ।
तदेतज्जगदित्युक्तं द्रव एव यथा जलम् ॥ २८ ॥
इदं जगद्भानमभानमेव चिद्व्योम शून्यं परमार्थ एव ।
यथर्थसंदर्शनबुद्धबुद्धेरबुद्धबुद्धेस्तु यथा तथास्तु ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवाल्मीकिजी ने
कहा : मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी के यह कहने पर श्लाघनीय धर्मात्मा महाराज दशरथ ने श्रीरामचन्द्रजी
के साथ सभा में समुपस्थित उन सकल साधुपुरुषों की, मुनियों की, ब्राह्मणों की, राजाओं की तथा
आकाशचारी सिद्ध और देवगणों की श्रीवसिष्ठ, विश्वामित्र आदि मुनियों द्वारा उपदिष्ट क्रम से
मणि-मोती आदि के निष्क्रयरूप धन से, दिव्य फूलों से, मणि-रत्न आदि के प्रदान से, मुक्तामाला
के समर्पण से, विनय, प्रणाम, धनसहित कन्याप्रदान, वस्त्र आसन, अन्न, पान, सुवर्ण, भूमि, धूप,
गन्ध, माला आदि से यथायोग्य पूजा की । पूजा करने के उपरान्त सभा के बीच से दूसरों का सम्मान
करनेवाले महाराज दशरथ वसिष्ठ आदि देवर्षियों के सहित सारी सभा के साथ वैसे ही उठे जैसे कि
सायंकाल के समय आकाश से चन्द्रमा उठता हे