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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, Verses 46–47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, verses 46–47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 204 · श्लोक 46,47

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे सकल धर्मो के ज्ञाता, हे सकल ज्ञानो के महासागर, हे सकल सन्देहरूपी वृक्षों का उच्छेद करने के लिए परशु (कुठार) रूप तथा हे शत्रुओं के भी शोक ओर भय की निवृत्ति करनेवाले हे ब्रह्मन्‌, मेरे लिए अन्य श्रवणीय अथवा ज्ञातव्य क्या शेष है ? जो कुछ भी श्रोतव्य या ज्ञातव्य मेरे लिए अवशिष्ट हो वह सब आप मुझसे कहने की कृपा कीजिये