Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, Verses 6–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, verses 6–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 204 · श्लोक 6-15
संस्कृत श्लोक
कथं च तेजः संपन्नं संपन्ना च कथं क्रिया ।
कथं च कालः संपन्नः संपन्नः पवनः कथम् ॥ ६ ॥
कथं च शून्यं संपन्नं संपन्नं चिन्नभः कथम् ।
इति ज्ञातं मया भूयो बोधाय वद मे प्रभो ॥ ७ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ब्रूहि राघव तत्त्वेन स्वप्नदृष्टमहापुरे ।
संपन्ना भूः कथमिव संपन्नं कथमम्बरम् ॥ ८ ॥
कथं वारि च संपन्नं संपन्ना उपलाः कथम् ।
कथं च तेजः संपन्नं संपन्नाश्च कथं दिशः ॥ ९ ॥
संपन्नश्च कथं कालः संपन्ना च कथं क्रिया ।
कथमेतन्निमित्तादि सर्वं संपन्नमुच्यताम् ॥ १० ॥
केनेदं निर्मितं दग्धमानीतं रचितं चितम् ।
उत्पादितं प्रकटितं किमाचारं किमात्मकम् ॥ ११ ॥
श्रीराम उवाच ।
आत्मास्य केवलं व्योम न सद्भूम्यचलादिकम् ।
जगतः स्वप्नरूपस्य निराकारो निरास्पदः ॥ १२ ॥
आत्मैव व्योमरूपोऽस्य निराधारो निराकृतिः ।
विनाकृतेर्वा व्योम्नोऽस्य किमाधारेण कारणम् ॥ १३ ॥
न किंचिदेतत्संपन्नं सद्यथैतन्न संविदः ।
एतच्चित्कचनं नाम मन एव तथा स्थितम् ॥ १४ ॥
संविदेव किल व्योम तिष्ठति व्योमतामिता ।
दृषत्तयास्ते काठिन्याद्द्रवाज्जलमिव स्थिता ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि की
मुखकान्तिरूप चन्द्रमा से विकसित से हुए अपने कुल के केरवभूत (रात को खिलनेवाला सफेद कमल)
श्रीरामचन्द्रजी महाराज जब इस प्रकार परमानन्द को प्राप्त हो गये, जब बडवानल के तुल्य भगवान्
सूर्य, जो तेजःपुंजरूपी देदीप्यमान ज्वालाओं से युक्त तथा बड़वानल के समान ही समग्र रसो का पान
करनेवाले हें, आकाशरूपी महासागर के नाभि के सदृश हो गये यानी मध्य आकाश में स्थित हो गये,
जब आकाशरूपी नीलकमल, जो सूर्यरूपी कर्णिका से मनोहर, देदीप्यमान किरणरूपी केसरो से
सुशोभित था तथा जिससे रजरूपी पराग गिर रहा था, अत्यन्त सुहावना मालूम होता था, वह
आकाशरूपी नीलकमल मानों जगत्-लक्ष्मी का शिर का भूषण था, त्रिलोकीरूपी नायिका का कणभिरण
(कानों का आभूषण) था । वह कर्णाभरण और शिरोभूषण भीतर जड़े हुए चमकीले सितारेरूपी विविध
रत्नों से सुशोभित था, जब दिशारूपी नायिकाओं ने विशाल पर्वतशिखररूपी हाथों से धूप से मिश्रित
जल रहित महामेघो को दर्पणो की नाई पकड रखा था तथा जब सूर्यरहित भी आकाश श्रेष्ठतम सूर्यकान्त
मणियों से निकली हुई आग से प्रदीप्त होने के कारण सूर्य से भी दुगुना सा जल रहा था उस मध्याह
समय में समय की सूचना देने के लिए बजनेवाले शंख प्रलय काल की वायु से पूर्ण सागरो की तरह प्रचुर
मुखवायु से पूरित होकर बजे | कमलो पर ओस की बुँदों के समान लोगों के मुख मण्डलो पर पसीने की
बुँदों स्थिति की, जिनका आकार-प्रकार इधर उधर बिखरे हुए मोतियों के समान था । जैसे वृष्टि
और नदी का जल सागर को भरता है वैसे ही घर की दीवारों मे टक्कर लगने से प्रतिध्वनि के रूप लौटे
हुए तथा प्राणियों के कर्मत्वराप्रयुक्त शब्दसंभ्रम से पुष्ट हुए शब्द ने लोगों के कानों को भर दिया ।
मध्याह काल में सुवासिनी (सौभाग्यवती) महिलाओं द्वारा गर्मी की प्रखरता को शान्त करने के लिए
उड़ाई हुई सफेद कर्पूरयुक्त जल सींचनरूपी नूतन -मेघमाला उल्लास को प्राप्त हुई