Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 182
एक सौ अस्सीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इक्यायीवां सर्ग मथुरा जाते-जाते मार्ग भूल जाने से उनका गौरीवन मेँ गमन तथा वहाँ पर वृद्ध तपस्वी के साथ वार्तालाप का वर्णन |
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- Verse 1कुन्ददन्त ने कहा : भगवन्, जैसे चन्द्र और सूर्य इन्द्रपुरी को, जो पूर्व दिशा में हैं, जान…
- Verse 2क्रम से अपने आवासस्थानो का वर्णन करते हैँ । रोध नामक गाँव में पहुँचकर आम के वनों की अधिकत…
- Verses 3–7दूसरे दिन मार्ग में परस्पर के वृत्तान्तो के श्रवण से आनन्दमग्न चित्तवाले हम लोगों ने अपना…
- Verses 8–13तीसरे दिन हम लोग कमलराशियों तथा लतानिकुंजों से परिवेष्टित जंगल में पहुँचे जो चारों ओर घास…
- Verses 14–16यहाँ पर पुष्पराशि से परिपूर्ण सुन्दर वृक्षों की छाया में सलोने मृगछौने सोये रहते हे । पर्…
- Verses 17–25उक्त तपस्वी के यह कहने पर हम दोनों उस मुनि-आश्रम में जब पहुँचे तो हमने उस महावन में आश्रम…
- Verse 26उस वृद्ध तपस्वी के यह कहने पर मैंने भी कहा : भगवन्, यह सब हम कुछ नहीं जानते इसलिए आप ही…
- Verse 27यह सुनकर वह भगवान तपस्वी फिर ध्यान में मग्न हो गये । समाधि द्वारा उन्होने हमारा ओर अपना स…
- Verse 28एक मुहूर्त में ध्यान से जागकर मुनि ने कहा : हे कार्यज्ञ आर्यो, आप लोग आश्चर्यभूत इस वृत्त…
- Verses 29–30हे साधु लोगों, मेरा आवासभूत सुन्दरता के कारण इस काननदेवी की चोटी-सा जो यह कदम्बवृक्षरूपी…
- Verse 31उनके यहाँ रहने के कारण यहाँ विशाल निबिड जंगल हो गया, यह पुष्पप्रधान ऋतुओं से विभूषित वन ग…
- Verses 32–34हे सज्जनों, जहाँ पर भ्रमरियों के मनोमोहक गीत विलासों से कोयल चंचल रहते थे, फूलों की वर्षा…
- Verses 35–38इस वन का प्रत्येक भाग हारीत, हंस, तोते, कोकिल, चक्रवाक, सारस ओर गोरिया के झुण्डों से भरा…
- Verses 39–53इस प्रकार के उत्तम वन में भगवान शंकरजी की अर्धागिनी जगदम्बा भगवती गौरी किसी कारण से भगवान…