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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, Verses 8–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, verses 8–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 182 · श्लोक 8-13

संस्कृत श्लोक

कालेनानन्तरमसावेकः श्रीपर्वतं गतः । स्वामिनं कार्तिकेयं च द्वितीयस्तपसे गतः ॥ ८ ॥ वाराणसीं तृतीयस्तु चतुर्थोऽगाद्धिमाचलम् । इहैव ते परे धीराश्चत्वारोऽन्ये परं तपन् ॥ ९ ॥ सर्वेषामेव चैतेषां प्रत्येकं त्वेतदीप्सितम् । यथा समस्तद्वीपाया भुवोऽस्याः स्यां महीपतिः ॥ १० ॥ अथ संपादितं तेषां सर्वेषामेतदीप्सितम् । तपस्तुष्टाभिरिष्टाभिर्देवताभिर्वरर्वरैः ॥ ११ ॥ तपतस्ते ततो याता भ्रातरः सदनं निजम् । भूमौ धर्मयुगं भुक्त्वा वेधा ब्रह्मपुरीमिव ॥ १२ ॥ तैर्भवद्भ्रातृभिर्भव्य वरदानविधौ तदा । इदं वरोद्यता यत्नात्प्रार्थिताः स्वेष्टदेवताः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

तीसरे दिन हम लोग कमलराशियों तथा लतानिकुंजों से परिवेष्टित जंगल में पहुँचे जो चारों ओर घास ओर लकड़ियाँ ले जानेवाले लोगों द्वारा काट-काट कर विभक्त बनाया गया था अतएव बादलों के विच्छेदो से (खण्डो से) विभक्त आकाश-सा था । वहाँ पर प्रस्तुत मार्ग को छोडकर दूसरे वन में प्रवेशकर रहे उस तपस्वी ने मुझसे वृथा कालविलम्ब द्वारा प्रस्तुत गृहगमनरूप कार्य में विघ्न डालनेवाला अकार्यकरणरूप वचन कहा : हम लोग यहाँ गौरी के आश्रम में चलें, यह आश्रम मुनियों के मण्डल से सुशोभित हे । मेरे सात भाई मेरी ही नाई पृथिवीपति बनने के अभिलाषी होकर यहाँ पर स्थित हैँ । हम सब मिलकर ये आठ भाई हैं । पूर्ववर्णित सप्तद्रीपों के राज्यभोग की इच्छा से उत्पन्न अनेक मनोरथो से युक्त होने से हम आठों भाई तपस्या के लिए एक संविन्मय एक ही दृढ़ निश्चयवान्‌ हुए । इस कारण वे शेष सात भाई भी अपने दृढ निश्चय का अवलम्बन कर यहाँ गौरीकानन में तपस्या के लिए स्थित हैं । विविध तपस्याओं से उन्होने अपने सब पाप काट डाले हैँ । उन भाइयों के साथ आकर यहाँ गौरी आश्रम में पहले छ.महीने मैं रहा हूँ इस कारण पहले मैंने जो देखा था वही यह गौरी-कानन हे