Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, Verses 35–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, verses 35–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 182 · श्लोक 35-38
संस्कृत श्लोक
चिरंटिकोवाच ।
देवि देवाधिदेवेन यथा ते प्रेम शंभुना ।
भर्त्रा मम तथा प्रेम स भर्तास्तु ममामरः ॥ ३५ ॥
देव्युवाच ।
आसृष्टेर्नियतेर्दार्ढ्यादमरत्वं न लभ्यते ।
तपोदानैरतोऽन्यं त्वं वरं वरय सुव्रते ॥ ३६ ॥
चिरंटिकोवाच ।
अलभ्यमेतन्मे देवि तन्मद्भर्तुर्गृहान्तरात् ।
मृतस्य मा विनिर्यातु जीवो बाह्यमपि क्षणात् ॥ ३७ ॥
देहपातश्च मे भर्तुर्यदा स्यादात्ममन्दिरे ।
तदेतदस्त्विति वरो दीयतामम्बिके मम ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस वन का प्रत्येक भाग हारीत, हंस, तोते,
कोकिल, चक्रवाक, सारस ओर गोरिया के झुण्डों से भरा रहता था । भेरुण्ड, गौरिया, तीतिर, राढा,
मयूर, बगुला आदि द्वारा की गई विविध क्रीडाओं से रमणीय था । यहाँ पर कदम्बवृक्षतलनिवासिनी
श्रीसरस्वती देवीजी के चरणकमलों में गन्धर्व, यक्ष, देवता और सिद्ध अपने मुकुटो को रगडते थे
(प्रणाम करते थे) यह वन सुगन्ध वायु का आवास था, अतएव इसके सूर्वण के समान रमणीय
चम्पकों से सितारों और मेघों ने सुगन्ध ग्रहण की । मन्द वायु से अपने स्थान से हटनेवाले पल्लवं
से युक्त छोटी-छोटी नवीन लताओं के विस्तारो से छिपे हुए निकुंजों में सूर्य की रश्मियों के न
पहुँचने के कारण यह वन खूब ठण्डा रहता था । कदम्ब, कनेर, नारियल, ताड और तमाल के वृक्षों
की इसमें इतनी अधिकता थी कि उनके फूलों के कणों से यह सारा वन पीला रहता था । इसमें रक्त
कमलों से मिले हुए कुई और कमलो से पूर्ण तालाब में हंस चकोर आदि जलचर पक्षियों के झुण्डों
के साथ अपनी मस्त चाल से चलते थे तथा तालीस, गुग्गुल, चन्दन, निम्ब आदि वृक्षों के अन्दर
विहार करनेवाली (रहनेवाली) बड़ी विचित्र सर्व अभिलाषा पूर्ण करनेवाली शक्ति थी