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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, Verses 14–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, verses 14–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 182 · श्लोक 14-16

संस्कृत श्लोक

देव्यस्माकमिमे सर्वे सप्तद्वीपेश्वरस्थितौ । सत्याः प्रकृतयः सन्तु सर्व आश्रमवासिनः ॥ १४ ॥ तमिष्टदेवतासार्थमुररीकृत्य सादरम् । तेषामस्त्वेवमित्युक्त्वा जगामान्तर्द्धिमीश्वरी ॥ १५ ॥ ते ततः सदनं यातास्तेषामाश्रमवासिनः । सर्व एव गताः पश्चादेक एवास्मि नो गतः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

यहाँ पर पुष्पराशि से परिपूर्ण सुन्दर वृक्षों की छाया में सलोने मृगछौने सोये रहते हे । पर्णशालाओं के छप्परों के किनारे पर बैठे हुए तोते विविध शास्त्रों के सिद्धान्तो का विस्तार से वर्णन करते हैँ । इसलिए आओ सर्वविध मंगल के लिए ब्रह्मलोक-सदृश मुनि-आश्रम में चलें । वहाँ पर पुण्यो से हमारा मन, सकल दोषों का विनाश होने से अत्यन्त स्वच्छ हो जायेगा । तत्त्वदर्शन से परिपूर्ण मनवाले महात्माओं के दर्शन के लिए विद्वान्‌, सुधीर ओर तत्त्वज्ञानी पुरुषों का भी मन छटपटाता है हमारी तो कौन बात है