Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 182 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
वृद्धतापस उवाच ।
तस्मिन्नेव कदम्बेऽस्मिन्वर्षाणि स्वेच्छया दश ।
स्थित्वा गौरी जगामाथ हरवामार्धमन्दिरम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
कुन्ददन्त ने कहा : भगवन्, जैसे चन्द्र और सूर्य इन्द्रपुरी को, जो पूर्व दिशा में हैं, जाने के लिए
प्रवृत्त हो सायंकाल में पश्चिम दिशा में आवास लेते हैं वैसे ही प्रसन्नवदन हम लोग भी मथुरापुरी के लिए
रवाना हो शाम तक चलकर मध्य में आवास में जाने के लिए प्रवृत्त हुए
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ अस्सीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इक्यायीवां सर्ग मथुरा जाते-जाते मार्ग भूल जाने से उनका गौरीवन मेँ गमन तथा वहाँ पर वृद्ध तपस्वी के साथ वार्तालाप का वर्णन |