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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, Verses 17–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, verses 17–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 182 · श्लोक 17-25

संस्कृत श्लोक

अहं केवलमेकान्ते ध्यानैकगतमानसः । वागीश्वरीकदम्बस्य तले तिष्ठामि शैलवत् ॥ १७ ॥ अथ काले वहत्यस्मिन्नृतुसंवत्सरात्मनि । इदं सर्वं वनं छिन्नं जनैः पर्यन्तवासिभिः ॥ १८ ॥ इदं कदम्बमम्लानं जनताः पूजयन्त्यलम् । वागीश्वरीगृहमिति मां चैवैकसमाधिगम् ॥ १९ ॥ अथैनं देशमायातौ भवन्तौ दीर्घतापसौ । एतत्तत्कथितं सर्वं ध्यानदृष्टं मयाखिलम् ॥ २० ॥ तस्मादुत्थाय हे साधू गच्छतं गृहमागतौ । तत्र ते भ्रातरः सर्वे संगता दारबन्धुभिः ॥ २१ ॥ अष्टानां भवतां भव्यं सदने स्वे भविष्यति । महात्मनां ब्रह्मलोके वसूनामिव संगमः ॥ २२ ॥ इत्युक्ते तेन स मया पृष्टः परमतापसः । संदेहादिदमाश्चर्यमार्यास्तद्वर्णयाम्यहम् ॥ २३ ॥ एकैव सप्तद्वीपास्ति भगवन्भूरियं किल । तुल्यकालं भवन्त्यष्टौ सप्तद्वीपेश्वराः कथम् ॥ २४ ॥ कदम्बतापस उवाच । असमञ्जसमेतावदेव नो यावदुच्यते । इदमन्यदसंबद्धतरं संश्रूयतां मम ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त तपस्वी के यह कहने पर हम दोनों उस मुनि-आश्रम में जब पहुँचे तो हमने उस महावन में आश्रम को प्रलयरूप से रूपवान्‌ यानी शून्य देखा । न वहाँ कोई वृक्ष देखा, न कोई कुटिया देखी, न कोई आडी देखी, न कोई मनुष्य देखा, न कोई मुनि देखा, न कोई बच्चा देखा, न वेदी देखी और न कोई ब्राह्मण देखा । इनके अतिरिक्त ओर भी वहाँ कुछ न था । वह असीम जंगल केवल अत्यन्त शून्य ही था चारों ओर सूर्य के ताप से सन्तप्त वह भूमि मेँ स्थित आकाश-सा लगता था । इसके पश्चात्‌ उस तपस्वी के हाय यह क्या अनर्थ हो गया यह कहने पर हम लोगों ने चिरकालतक भटक कर एक जगह एक वृक्ष देखा । उस शीतल वृक्ष की छवि आकर्षक थी, छाया अतिघन थी, वह जलपूर्णं मेघ के समान गहरी हरियाली लिये काला था । उसके नीचे एक बूढा तपस्वी समाधि लगाये बैठा था । हम दोनों उस मुनि के आगे छाया में हरी घास से आच्छन्न भूमि पर बैठ गये जब चिरकालतक प्रतीक्षा करने पर भी वह तपस्वी ध्यान से निवृत्त नहीं हुआ तब चिरकाल की प्रतीक्षा से उत्पन्न उद्वेगवश अपने चंचल स्वभाव से मैंने हे मुने ध्यान से जागिये” यह वचन जोर से कहा मेरे ऊँचे स्वर से मुनि ध्यान से जाग गये और सिंह के समान मेघ ध्वनि से जंभाई लेकर उन्होंने कहा : हे साधु, आप लोग कौन हैं, यह गौरी-आश्रम कहाँ गया, मुझे यहाँ शून्यवन में कौन लाया और यह कौन काल (युग) है ?