Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, Verses 3–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, verses 3–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 182 · श्लोक 3-7
संस्कृत श्लोक
ततो गौर्या प्रयातायां तद्वनं तादृशं महत् ।
सामान्यवनतां यातं जनवृन्दोपजीवितम् ॥ ३ ॥
मालवो नाम देशोऽस्ति तत्राहं पृथिवीपतिः ।
कदाचित्त्यक्तराज्यश्रीर्मुनीनामाश्रमान्भ्रमन् ॥ ४ ॥
इमं देशमनुप्राप्त इह चाश्रमवासिमिः ।
पूजितोऽस्य कदम्बस्य ध्याननिष्ठस्तले स्थितः ॥ ५ ॥
केनचित्त्वथ कालेन भ्रातृभिः सप्तभिः सह ।
भवानभ्यागतः पूर्वं तपोर्थमिममाश्रमम् ॥ ६ ॥
तपस्विनोऽष्टाविह ते तथा नाम तदाऽवसन् ।
यथा तपस्विनोऽन्ये ते तेषां मान्यास्तपस्विनः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरे दिन मार्ग में परस्पर के वृत्तान्तो के
श्रवण से आनन्दमग्न चित्तवाले हम लोगों ने अपना बहुत-सा मार्ग लाँघा शीतल जल के रनों
तथा ठण्डी छायावाले वनवृक्षों से पूर्ण, नदी तट पर उगी हुई लताओं द्वारा वर्षाई गई पुष्पराशियों
से सफेद, तैर रही तरंगों के झनकार रूपी गायन से पथिकों को आनन्दित करनेवाली, स्निग्ध
छायावाले वनवृक्षों के तले बैठे मृग और पक्षियों के भाँति भाँति के शब्दों से गूजित, जिनकी बड़ी-
बड़ी हरी घासो की शाखाओं के अग्रभाग में ओस की बूँदरूपी मोती गुँथे हुए थे, कहीं पर जंगलरूप,
कहीं पर पर्वतप्राय, कहीं पर गाँव-नगररूप, कहीं पर गर्तरूप ओर कहीं पर दलदलरूप पृथिवी को
तथा नाना नदियों, स्रोतों और सरोवरों को पारकर उस दिन बर्फ से अत्यन्त शीतल केले के घने
वन में केले के पत्तों के बिस्तर पर लेटकर हम लोगों ने रात बिताई