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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 174

एक सौ बहतर्व सर्ग समाप्त एक सौ तिहत्तरवां सर्ग जैसे चित्‌ का भी देहादि जड़ पदार्थो में अहन्ता का आग्रह है ओर जैसे उसकी सर्वात्मकता है, उसका प्रतिपादन ।

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  1. Verses 1–2श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, यदि स्वप्रकाश चित्‌ का चमत्कार ही जगत्‌ है तो तुल्य ह…
  2. Verse 3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, सकल देह की अहन्ता से प्रसिद्धि समान होने पर भी जैसे देही…
  3. Verses 4–7जैसे आकाश का शून्य में शून्यताहन्ता में आग्रह है वैसे ही सर्वात्मा का द्रव्य में (मणि, मो…
  4. Verse 8अन्तिम तीसरे ओर चौथे दो प्रश्नो का भी समाधान करते हैं। जैसे चेतनरूप से अभिमत शरीर का केश,…
  5. Verse 9चित्‌ के वितूविरुद्ध अचित्त्त की तरह निरवयव चित्‌ की सावयवता भी स्वप्न के अनुभव के बल से…
  6. Verses 10–11मायाशवल चेतन ओर अचेतन उभय स्वरूप एक वस्तु है, अतः उसमें चेतन ओर अचेतन उभय व्यवहार प्रवर्त…
  7. Verses 12–13अतएव तत्वतः ब्रह्मज्ञान होने से सब विरुद्ध धर्म हट जातेहैं, ऐसा कहते हैं। जैसे “यह स्वप्न…
  8. Verse 14सागर मेँ जल के भँवरों की तरह चिदाकाश में हजारों करोड कल्पो तक वे ही या अन्य सृष्टियाँ आती…
  9. Verses 15–16जैसे जल समुद्र में तरंग आदि मेँ भासमान आवर्त, बुद्बुद्‌आदि नाना स्वरूप बनाता है वैसे ही म…
  10. Verses 17–18मैं तरंग नहीं हूँ बल्कि जल ही हूँ, ऐसा युक्तिपूर्वक जिस तरंग ने समझ लिया फिर उसकी तरंगता…
  11. Verse 19हे श्रीरामजी, अपने वास्तविक रूप का त्याग न कर रहे चिदाकाश का स्वप्नकी तरह अन्योन्य के धर्…
  12. Verse 20इस तरह आदिम प्रजापति निराकार निर्विकार तथा चिन्मात्रस्वरूप संकल्पनगर के तुल्य कारणविहीन हे
  13. Verse 21जिस सुवर्णमय अंगद ने (वाजूबन्द ने) अंगदत्व नहीं है (सुवर्णं ही सत्य है विकारभूत अंगदत्व न…
  14. Verse 22चिन्मात्रआकाशस्वरूपी जन्मादिविकारविहीन परम ब्रह्म मे (अहम्‌) (मैं) , त्वम्‌ (तुम), जगत्‌…
  15. Verses 23–26चिदाकाश में जो शून्यतारूप चित्‌ के चमत्कार स्फुरित होते हैं वे ही ये सृष्टि, प्रलय और स्थ…
  16. Verse 27वह विराट ही सृष्टि है वही स्वप्न है, स्वप्न ही जाग्रद्‌ व्यष्टि समष्टि स्वरूप बन गया । जै…
  17. Verses 28–29सकल जगत्‌ का विराट के अंगरूप से वर्णन करते हैं। अवान्तर प्रलयरूपी ब्रह्मा की रात्रि विराट…
  18. Verse 30इस प्रकार भली भाँति दृष्टिगोचर हो रहा विस्तृत आकृति वास्तव मेँ शून्यात्मा अतएव हमारे मनोर…
  19. Verses 31–32विराट्रूप चिन्मय आकाश ही प्रतीत होता है
  20. Verse 33जैसे स्वप्न में प्राप्त हुआ नट अपने को ही अपने से अतिरिक्त नाट्यदर्शक समाज से भरा स्वप्नद…
  21. Verse 34इसी अर्थ में सकलवादियों के मत का अविरोध है और इसी से सबके वांछित फल की सिद्धि होती है, ऐस…