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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verses 10–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

निर्विकल्पं परं जाड्यं सविकल्पं तु संसृतिः । ध्यानं तेन समाधानं न संभवंति किंचन ॥ १० ॥ सचेत्यं संसृतिर्ध्यानमचेत्यं तूपलस्थिति । मोक्षो नोपलवद्भानं न विकल्पात्मकं ततः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

मायाशवल चेतन ओर अचेतन उभय स्वरूप एक वस्तु है, अतः उसमें चेतन ओर अचेतन उभय व्यवहार प्रवर्तकता विरुद्ध नहीं है, इस आशय से कहते हैं। जैसे पुरुष का नख, केश, जल, आकाश, धर्मवाला आकारवान्‌ एक शरीरचेतन-अचेत दोनोंरूपवाला है वैसे ही सर्वात्मा का स्थावर जंगमरूप एक शरीर चेतन और अचेतन दोनों स्वरूपवाला है, किन्तु वह नित्य निराकार है