Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
भ्रांतिः शाम्यति शास्त्रार्थात्सम्यग्बुद्ध्यावलोकितात् ।
आत्मज्ञानमयान्मोक्षोपायादेवेह नान्यतः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
वह विराट ही सृष्टि है वही स्वप्न है, स्वप्न ही जाग्रद् व्यष्टि
समष्टि स्वरूप बन गया । जैसे घनी सुषुप्ति निद्राधिक्यरूप अन्धकार से स्वप्न होती है । वैसे ही प्रलय
में अविद्यारूपी अन्धकार से आवृत आत्मा ही जगद्रूप होता हे