Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verses 15–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 15,16
संस्कृत श्लोक
तदनन्तसुषुप्ताख्यं तत्तुरीयमिति स्मृतम् ।
तन्निर्वाणमिति प्रोक्तं तन्मोक्ष इति शब्दितम् ॥ १५ ॥
सम्यग्बोधैकघनता यासौ ध्यानमिति स्मृतम् ।
दृश्यात्यन्तासंभवात्म बोधमाहुः परं पदम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल समुद्र में तरंग आदि मेँ भासमान आवर्त, बुद्बुद्आदि
नाना स्वरूप बनाता है वैसे ही मायाशबल चेतन अपने चेतनमें सृष्टि आदि नाना संज्ञाएँ करता हे ।
अतत्त्वज्ञ जनता के निश्चय के सिवा तत्त्वज्ञानी के प्रति यह यथास्थित विश्व सदा निर्विकार ब्रह्म ही हे ।
यानी तत्त्वज्ञ इस सम्पूर्ण प्रपंच को निर्विकार ब्रह्म ही जानता है मगर अज्ञानियों का निश्चय इससे
विपरीत है