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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

स्वानुभूयत एवेयं भ्रान्तिः स्वप्नजगत्स्विव । कारणं त्वनुमासाध्यं क्वानुमाऽनुभवाधिका ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्तिम तीसरे ओर चौथे दो प्रश्नो का भी समाधान करते हैं। जैसे चेतनरूप से अभिमत शरीर का केश, नख आदि में अचेतनत्वाग्रह है वैसे ही चिद्रूप सर्वात्मा का भी काष्ठ, पत्थर आदि में अचेतनत्वाग्रह हे । चिति चित्तव का त्याग नहीं कर सकती है तथा अचितत्त्व का ग्रहण नहीं कर सकती है, इस शंका का मायागत आवरण ओर विक्षेप शक्ति से अघटित की घटना होने से परिहार करना चाहिये, यह भाव है