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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verses 12–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

न च नामोपलाभेन निर्विकल्पसमाधिना । अन्यदासाद्यते किंचिल्लभ्यते किं स्वनिद्रया ॥ १२ ॥ तस्मात्सम्यक्परिज्ञानाद्भ्रान्तिमात्रं विवेकिनः । सर्गात्यन्तासंभवतो यो जीवन्मुक्ततोदयः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव तत्वतः ब्रह्मज्ञान होने से सब विरुद्ध धर्म हट जातेहैं, ऐसा कहते हैं। जैसे “यह स्वप्न हैं” यों स्वप्न के ज्ञाता पुरुष का स्वप्न में देखा गया पदार्थभ्रम शान्त हो जाता है वैसे ही सम्यग्‌ ज्ञानवान्‌ पुरुष का यह जगत्‌ ज्यों का त्यों शान्त हो जाता है, विलुप्त हो जाता है। स्वप्नद्रष्टा (स्वप्न देखनेवाले) पुरुष की जो प्रातः काल के समय प्रसिद्ध प्रबुद्धता है वही प्रबुद्धता, न द्रष्टा है न दृश्यता हे किन्तु यह सब मौन चिन्मात्राकाश ही है, ऐसा निश्चय करने में पूर्णरूपेण समर्थ है