Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 170
एक सौ अड़सठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ उनहत्तरवाँ सर्ग विश्रान्त चित्तवाले जीवन्मुक्त के प्रचुर लक्षणों का तथा आत्मवान् की सदा सुप्ति का कथन ।
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- Verses 1–4यदि आपने मन्द अधिकारियों का अज्ञान मुखविकारादि चिहठो से ताड लिया तो अज्ञान की निवृति किन…
- Verse 5श्रीरामचन््रजी पूर्वोक्त प्रथम श्लोक द्वारा कथित लक्षण के जड, उन्मत्त ओर मूर्छितो मे व्यभ…
- Verses 6–9वहाँ पर 'अन्तर्मुखमते: इस विशेषण से ही उक्त व्यभिचार का निवारण हो जाने से कोड दोष नहीं है…
- Verse 10जिस महापुरुष ने विश्रामशून्य निराधार ओर लम्बे संसाररूपी मार्ग में चिन्मात्र के दर्शन से आ…
- Verse 11जो लोग चिरकाल तक बीहड़ संसारमार्ग मे भटककर परमपद मेँ विश्राम पा चुके वे लोकव्यवहार में नि…
- Verse 12वे शुद्धचिद्रूप भास्कर चैत्य ओर चिदाकाश से यानी दृश्य और द्रष्टा से शून्य स्वचित्ताकाश मे…
- Verse 13उत्तम पुरुष सदेह होते हुए तथा व्यवहार में निरत होते हुए भी सोये हुए से, विदेह से ओर मूढ स…
- Verse 14सुप्ता:' इस पद के तात्पर्य का विवरण करते हैँ । जो लोग इस स्वप्ननगर में शय्याओं मे सोये हु…
- Verse 15तब किस अंश से उसकी सुप्त से समता है यह पूछो तो विश्रान्ति और मौन से है, ऐसा कहते हैँ । दी…
- Verse 16अविद्यारूपी अन्धकार में विविध व्यवहार कर रहे अतएव उल्लू के तुल्य सकल भूतो की जो अविद्या क…
- Verse 17इस दुःखदायक जिस दृश्य में सब भूत जाग्रत् रहते हैं उसमें सदा सुप्त हे यानी वह सुखी उसे नह…
- Verse 18सर्वकर्मसंन्यास भी उसका लक्षण है, ऐसा कहते है। हे रघुद्रह, जो सकल कर्मो का अनादर कर (त्या…
- Verse 19जन्म, जरा आदि संसारक्लेश से निर्मुक्त होकर इस संसार-सागर के पार पहुँचा हुआ उत्तम पुरुष नि…
- Verses 20–22"धावित्वा ये चिरं कालम्“ (जो विरकालतक परिभ्रमण कर) इसके अर्थ का विस्तार करते है । दीर्घस…
- Verses 23–26ही जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष खाते, चलते, साँस लेते और बोलते महाअरण्यरूप लोक में सुखपूर्वक स…
- Verse 27तत्त्वज्ञानियों की वह गाढ़ी नींद कोई अलौकिक ही है जो प्रलयकालीन मेघों के गर्जनों से तथा अ…
- Verse 28तत्त्ववेत्ताओं की वह कोई अपूर्व (अनूठी) ही गाढ़ी नींद है जो चिन्मात्र के दर्शन में प्रबुद…
- Verse 29जिसका नेत्रो को बन्ध किये बिना ही सारा विश्व विलीन हो जाता है, वह परमार्थ से पागल (न कि म…
- Verse 30अहा ! सारे जगत् को निगलकर परम पूर्णता को प्राप्त हुआ आत्मवान् पुरुष तृप्तिपर्यन्त (खूब…
- Verses 31–32अहा, विषयजन्य (वैषयिक) आनन्द के अभाव में भी निरतिशय आनन्द से महान् आनन्दवाला अक्षय अद्वै…
- Verse 33आत्मवान् का ऐसा सुखशयन है जिसमें असीम दुःखानुभव के विषय में विरति रहती है, वर्णाश्रमोचित…
- Verse 34अत्यन्त अणुओं में (सूक्ष्मों मैं) सबसे अत्यधिक अणुतम (सूक्ष्मतम) तथा अत्यन्त स्थूलपदार्थो…
- Verses 35–36अहा ! सूक्ष्म होने के कारण अत्यन्त अणु तथा व्यापक होने के कारण अतिस्थूल चिद्देह में प्रत्…
- Verse 37संसारसमूहरूप स्वप्न को, ज्ञान प्राप्त कर, प्रकट दिशाओं की तरह अपरिच्छिन्न सुषुप्तता को प्…
- Verse 38सम्पूर्ण जगत्पदार्थो की घटः सन् पटः सन्" इस प्रकार सत्रूप से सर्वत्र अनुगम होने के कारण…
- Verses 39–40पहले प्रविलोपन द्वारा आकाशता को प्राप्त जगत् को अव्याकृत आकाश से भी निर्मल चिदाकाश बनाकर…
- Verse 41लोकप्रवाहानुसार प्राप्त व्यवहाररूप मनोहर तृणराशि निर्मित चटाई पर विश्राम को प्राप्त हुआ आ…
- Verse 42जैसे जागरूक (जागे हुए) पुरुष,जिसने गाठी नींद में स्वप्न का अनुभव (७) “ज्यायानाकाशात्“ (आ…
- Verse 43परम चिदाकाशको प्राप्त आत्मज्ञानी पुरुष आकाश के सदृश विशाल स्वरूप के ज्ञान से अत्यन्त असत्…
- Verse 44इस प्रकार जीवन्मुक्त पुरुष का अज्ञानी की दुष्टि का स्वप्न कह कर परमार्थ दृष्टि में सदा वह…
- Verse 45जब तक प्रारब्ध का भोग रहता है तब तक उस मित्र के साथ क्रीड़ा कर उसके पश्चात् उसकी जीवन्मु…