Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verses 20–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, verses 20–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 20-22
संस्कृत श्लोक
ईदृशेनात्ममित्रेण स कलत्रेण संयुतः ।
स्वकर्मनाम्ना रमते स्वभावेनैव नेरितः ॥ २० ॥
श्रीराम उवाच ।
कलत्रमस्य मित्रस्य तदीयस्य मुनीश्वर ।
किं तत्किंरूपमेव स्यात्समासेनेव मे वद ॥ २१ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्नानदानतपोध्याननामानोऽस्य महामते ।
सन्ति पुत्रा महात्मानः स्वनुरक्ताखिलप्रजाः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
"धावित्वा ये चिरं कालम्“ (जो विरकालतक परिभ्रमण कर) इसके अर्थ का विस्तार करते है ।
दीर्घसंसाररूपी मार्ग में भ्रमण से थका हुआ, वंचना में चतुर देशोपद्रवों की नाई भोग-सामग्री
का अपहरण करनेवाले विषयों द्वारा चिरकाल तक भोगसाधन पदार्थो से व्याकुल होकर संसारमार्ग
में चला है, जरारूप (बुढापारूप) हिमपात ओर वज्रपात उसे बार वार व्यवहार के अयोग्य बनाते है,
व्यर्थ व्यग्रतापूर्वक विहार करनेवाला जन्मरूपी जंगल का मृगरूप वह पथिक नाना दुःखरूपी काँटों
से आकीर्ण सुदुर्लभ सुखरूपी छायावाले संसारमार्ग मेँ असहाय (अकेला) ही चला है