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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verses 35–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 35,36

संस्कृत श्लोक

स्वभाव एषैव भवेत्प्रबुद्धधियां प्रयत्नेन तु नेदृशास्ते । भवन्ति नेन्द्वर्कहुताशनाद्याः क्वचित्परप्रेरणया प्रकाशाः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

अहा ! सूक्ष्म होने के कारण अत्यन्त अणु तथा व्यापक होने के कारण अतिस्थूल चिद्देह में प्रत्येक परमाणु में अनन्त कोटि जगतों को धारण कर रहा आत्मज्ञानी पुरुष सुखपूर्वक सोता है । अनेक संहार (प्रलय) और सृष्टियाँ कर रहा वास्तव में कुछ न कर रहा आत्मज्ञानी पुरुष परम प्रकाशरूपी शय्या पर सुखपूर्वक सोता है