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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verses 6–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, verses 6–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 6-9

संस्कृत श्लोक

सहपांसुकृताक्रीडमाबाल्यादेव संगतम् । विनिवारितदुश्चेष्टं पितृवद्रक्षणोन्मुखम् ॥ ६ ॥ वह्नेरिवौष्ण्यं सौगन्ध्यं कुसुमस्येव सर्वदा । अविनाभावि विमलं रवेरिव च वासरम् ॥ ७ ॥ लालनैकरतं नित्ये पालनैकपरायणम् । सर्वसंकटसंघट्टरक्षणैकसमुद्यतम् ॥ ८ ॥ हेम्नोऽग्निरिव देहस्य सर्वावस्थस्य शुद्धिदम् । इदं हेयमुपादेयमिति दर्शनतत्परम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ पर 'अन्तर्मुखमते: इस विशेषण से ही उक्त व्यभिचार का निवारण हो जाने से कोड दोष नहीं है, इस अभिप्राय से श्रीवसिष्टजी उसके तात्पर्य को विशद करते हुए उत्तर देते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : जो शुद्धबोधात्मा चिदाकाश में अत्यन्त संलग्न होने के कारण प्रयत्न के बिना सुख को नहीं जानता है, वह विश्रान्त कहा जाता है। विवेक द्वारा जिसके सब पदार्थों से सम्बन्ध रखनेवाले सभी सन्देह वास्तव में क्षीण हो गये वह परम पद में विश्रान्त है, सकल सन्देह अज्ञानमूलक हैं अत: मूलअज्ञान के विनाश से सकल सन्देहो का विनाश हो जाता है, यह भाव हे । (इस विषय में भगवती श्रुति भी है -- “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कमणि तस्मिन्‌ दृष्टे परावरे" अर्थात्‌ परात्पर परमात्मा के दर्शन होने पर विद्अविद्‌अविवेकरूप हृदयग्रन्थि टूट जाती है, सव सन्देह मिट जाते है । व्यवहार करते हुए भी जिसके अन्दर किसी भी वस्तु में कहीं पर भी अनुराग नहीं है, वह विश्रान्त कहा गया है /) प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिल गया उससे निर्वाह कर रहे जिसके समस्त कार्य कामना ओर संकल्प से शून्य हैं, वह परम पद में विश्रान्त कहा गया हे