Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
सूर्यस्तम इवाजस्रमप्रदर्शयदप्रियम् ।
अनुरक्ता महेलेव प्रियमेवाप्रदर्शयत् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जो लोग चिरकाल तक बीहड़ संसारमार्ग मे भटककर
परमपद मेँ विश्राम पा चुके वे लोकव्यवहार में निरत होने पर भी विषयों के पीछे दौड़ने से (भटकने से)
उत्पन्न खेद को निवृत्त करने के लिए सोये हुए से दिखाई देते हैँ । विषयों के पीछे न दौड़ना ही उनका
विश्राम पा जाने का स्पष्ट लक्षण है