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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

प्रवृत्तवाक्पुण्यकथो जिह्मानां प्रतिभानवान् । निमेषेणैव निर्णेता वक्ताशु बहु वस्तुनः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मवान्‌ का ऐसा सुखशयन है जिसमें असीम दुःखानुभव के विषय में विरति रहती है, वर्णाश्रमोचित व्यवहार में लोकसंग्रह के लिए अविरति रहती है, बाह्य पदार्थ मेँ अनासक्ति रहती है और आभ्यन्तर सुख का निरन्तर भोग रहता है