Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
दुर्गदुर्गमदुर्वारदोषोद्धरणतत्परम् ।
सर्वविश्वासरत्नानां कोश आशैशवोषितम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन््रजी पूर्वोक्त प्रथम श्लोक द्वारा कथित लक्षण के जड, उन्मत्त ओर मूर्छितो मे व्यभिचार
की आशंका करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, जिसका सुखसाधन विषय समुदाय सुख के लिए नहीं है और
दुःखसाधन दुख के लिए नहीं है उस अचेतन मनुष्य को तो मैं जड़ ही समझता हूँ