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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

अनुरक्तान्नृपान्साधून्वदान्यान्कारयत्सदा । यज्ञदानतपस्तीर्थन्यायार्थप्रेरणोन्मुखम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस दुःखदायक जिस दृश्य में सब भूत जाग्रत्‌ रहते हैं उसमें सदा सुप्त हे यानी वह सुखी उसे नहीं देखता है । भगवान्‌ ने गीता में "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागृति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः। इस श्लोक से दो लक्षण दिखलाये हैं